तुल्यता के समय में ‘पिंकटैक्स’

तुल्यता के समय में ‘पिंकटैक्स’

आज वैश्विक स्तर पर महिलाएं पुरुषों की तुलना में एक समान उत्पादों के लिए अधिक राशि का भुगतान करती हैं। महिलाओं द्वारा चुकाई जाने वाली इस अलक्ष्यकर को ‘पिंकटैक्स’ का नाम दिया गया है| एक महिला के जीवन में लड़कियों के खिलौने और स्कूल की वर्दी से लेकर “एडल्टडायपर्स” (सैनिटरीपैड) तक पिंकटैक्स सभी उत्पादों में वसूला जाता है। पिंक टैक्स और कुछ भी नहीं बस लिंग के आधार पर की जाने वाली मूल्य निर्धारण या फिर एक ‘जेंडरटैक्स’ है। पिंक टैक्स का प्रभाव निजी स्वच्छता या पर्सनल हाइजीन और स्वास्थ्य संबंधी उत्पादों में अधिक देखने को मिलता है। आज अधिकांश पूंजीवादी अर्थव्यवस्था और कई देशों में पिंक टैक्स मौजूद है। पिंक टैक्स का आर्थिक प्रभाव यह है कि महिलाओं के पास ‘परचेसिंगपॉवर’ अर्थात् क्रयशक्ति कम हो जाती है। यद्यपि लिंग आधारित वेतन को ध्यान में रखा जाए तो पुरुषों की अर्थव्यवस्था में क्रयशक्ति और भी बढ़ जाती है।

महिलाओं द्वारा प्रयोग किए जाने वाले उत्पादों की अधिक राशि लेना कोई नई बात नहीं है।यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका में बिक्री प्रणाली दशकों पहले बनाई गई थी। 1992 में डी. सी. ए द्वारा महिलाओं के खिलाफ पूर्वाग्रह में की गई जांच में यह निष्कर्ष सामने आया कि महिलाओं ने
रोजमर्रा की ज़िंदगी में इस्तेमाल किए जाने वाले उत्पादों में पुरुषों से अधिक भुगतान किया। डी. सी. ए की इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद अन्य देशों ने भी अपने अपने देशों में इस विषय पर जांच शुरू कर दी। 1997 में कैलिफोर्निया ने मूल्य भेदभाव से उपभोक्ताओं की रक्षा के लिए एक बिल अधिनियामित किया। इससे प्रेरित होकर मैसाचुसेट्स, वॉशिंगटन डी. सी. और अन्य स्टेट्स ने भी पिंक टैक्स का विरोध करना शुरू किया। 2018 में डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रतिनिधि जैकी स्पियर ने ‘पिंक टैक्स रिपेल एक्ट’ पेश किया, लेकिन वह बिल असफल रहा। अन्य देशों में भी पिंक टैक्स के खिलाफ कई प्रोटेस्ट हुए। आज लोगों को लगता है कि इंडिया, मलेशिया, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा जैसे देशों में पिंक टैक्स अब मौजूद नहीं। पर अफसोस कि वास्तविकता कुछ और ही बयां करती है।


सुपरमार्केट में बिक्री के लिए जो सस्ते रेज़र्स होते हैं उनमें कोई फैंसी मॉइश्चराइजर स्ट्रिप, कोई जंग रहित टाइटेनियम नहीं होता, सिर्फ एक ब्लेड होती है, जिसके लिए महिलाओं को पुरुषों से 8.36% राशि अधिक चुकानी पड़ती है। उन रेज़र्स में सिर्फ रंग का फर्क होता है जो कि पुरुषों के लिए नीला और महिलाओं के लिए गुलाबी होता है।

अक्सर व्यक्तिगत देखभाल में इस्तेमाल किए जाने वाले उत्पादों में अलग-अलग कीमतों के अलावा पुरुष संस्करण और महिला संस्करण में कोई अंतर नहीं है। उदाहरण के रूप में सुपरमार्केट में बिक्री के लिए जो सस्ते रेज़र्स होते हैं उनमें कोई फैंसी मॉइश्चराइजर स्ट्रिप, कोई जंग रहित टाइटेनियम नहीं होता, सिर्फ एक ब्लेड होती है, जिसके लिए महिलाओं को पुरुषों से 8.36% राशि अधिक चुकानी पड़ती है। उन रेज़र्स में सिर्फ रंग का फर्क होता है जो कि पुरुषों के लिए नीला और महिलाओं के लिए गुलाबी होता है।

सिर्फ स्वास्थ्य संबंधी उत्पादों में ही नहीं किंतु कई सारे उत्पादों में पिंक टैक्स उपस्थित है। एक स्टडी के दौरान यह बताया गया कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में वरिष्ठ या घरेलू स्वास्थ्य के देखभाल के उत्पादों के लिए 8%, बच्चों के कपड़ों के लिए 4%, खिलौनों के लिए 7%, वयस्क कपड़ों के लिए 8% और व्यक्तिगत देखभाल के उत्पादों के लिए 13% अधिक भुगतान करती हैं।पिंक टैक्स केवल वस्तुओं की खरीदारी तक सीमित नहीं है। रात को जहां पुरुष पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल बिना किसी हिचकिचाहट के कर सकते हैं, वहीं महिलाओं को अपनी सुरक्षा का ध्यान रखते हुए अक्सर प्राइवेट कैब का इस्तेमाल करना पड़ता है।


1992 में डी. सी. ए द्वारा महिलाओं के खिलाफ पूर्वाग्रह में की गई जांच में यह निष्कर्ष सामने आया कि महिलाओं ने
रोजमर्रा की ज़िंदगी में इस्तेमाल किए जाने वाले उत्पादों में पुरुषों से अधिक भुगतान किया।

जब मार्केटिंग कंपनियों से सवाल किया जाता है कि आप महिलाओं से अकारण अधिक राशि वसूल करते हैं तो वे कहते हैं कि महिलाएं और पुरुष अलग-अलग हैं इसलिए उनके लिए बनने वाले उत्पादों में भी अंतर होता है। जैसे कि सुपरमार्केट में सस्ते रेज़र्स की राशि महिलाओं के लिए अधिक है चूंकि पुरुष ज्यादातर रेज़र्स खरीदते हैं, इसलिए बढ़ी हुई मांग कीमत को कम करने में मदद करती है। उसी तरह महिलाओं के परफ्यूम्स पुरुषों के परफ्यूम्स से महंगे हैं, भले ही दोनों ने लगभग एक जैसे पदार्थ उपस्थित होते हैं, क्योंकि महिलाओं के लिए बेहतर पैकेजिंग की जाती है।किंतु आगे एक सवाल और खड़ा होता कि क्या सिर्फ इन कारणों के आधार पर महिलाओं से अधिक कर वसूलना उचित है? महिलाओं का पुरूषों की तुलना में औसत वेतन कम होता है, इसके बावजूद उन्हें सामान्य वस्तुओं के लिए ज़्यादा भुगतान करना पड़ता है। पिंक टैक्स गैरकानूनी भले ही नहीं है पर इसका प्रभाव साधारण महिलाओं के जीवन में घातक साबित हुआ है। पिंक टैक्स नैतिकता का पालन नहीं करता।

हलांकि ऐसे कई व्यवसाय हैं जहां महिलाओं द्वारा चुकाए जाने वाला पिंक टैक्स बिल्कुल मान्य है।जैसे कि ‘हेयरसैलून’ में महिलाएं पुरुषों के मुकाबले अधिक भुगतान करती है, जो कि सही है क्योंकि आमतौर पर महिलाओं के बाल काटना पुरुषों की तुलना में कठिन होता है और उन्हें आवश्यकता के अनुसार कंडीशनिंग, ड्राइंग, स्मुथनिंग आदि प्रदान की जाती है। साथ ही महिलाओं के लिए ड्राईक्लीनिंग भी पुरुषों के मुकाबले अधिक महंगी होती है क्योंकि महिलाओं के कपड़ों में बहुत विविधता होती है और उन्हें सावधानीपूर्वक इस्त्री करने और धोने की आवश्यकता होती है। लेकिन महिलाओं से एक ही तरह की कमीज़ या किसी भी अन्य सामान्य कपड़ों के लिए पुरुषों कि तुलना में अधिक पैसे लेना अनैतिक कर वसूली में आता है। ऐसी प्रथा का विरोध करना और अपने अधिकार के लिए लड़ना आवश्यक है। मूल्य निर्धारण विशेषज्ञों का तर्क है कि व्यक्तिगत देखभाल के उत्पादों पर पिंकटैक्स सही आर्थिक अर्थ साबित करता है। परन्तु इस कारण अर्थव्यवस्था में महिलाओं का जो स्थान और पिछला होता जा रहा है, क्या यह चिंता का विषय नहीं?

मूल्य निर्धारण विशेषज्ञों का कहना है – चूंकि महिलाएं व्यक्तिगत देखभाल के उत्पादों और अन्य उत्पादों के लिए अधिक भुगतान करने को तैयार हैं इसलिए उनसे ज़्यादा कीमत वसूलना उचित है।इतना ही नहीं उनके अनुसार महिलाएं निजी स्वच्छता के प्रति अधिक देखभाल करती हैं इसलिए वे आवश्यक उत्पादों के लिए ज्यादा भुगतान ज़रूर करेंगी। इसी तर्क का फायदा उठाते हुए मार्केटिंग कंपनियों ने महंगे “मेंस्ट्रुअल केयर प्रोडक्ट्स” का बिजनेस कर बहुत मुनाफा कमाया है। जब जीएसटी ( गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स ) भारत में अस्तित्व में आया, तब सैनिटरी पैड्स पर कर 12% की दर से बढ़ा। इसके खिलाफ देश में कई प्रोटेस्ट किए गए। उन प्रोटेस्ट का नतीजा यह हुआ कि भारत में सैनिटरी पैड्स पर से 12% टैक्स हटा दिया गया।सभी देशवासियों ने इस नतीजे पर अपनी खुशी प्रकट की। पर सैनिटरी पैड्स के टैक्स फ्री होने से महिलाओं को फिर भी कुछ खास लाभ नहीं हुआ क्योंकि आज भी सैनिटरी पैड्स की कीमत उतनी ही ज़्यादा है जो पहले थी और आज भी हर महिला उन पैड्स को खरीदने में आर्थिक असफलता का सामना करती है। क्या सिर्फ कुछ मुनाफे के लिए महिलाओं की जरुरतों का अनैतिक लाभ उठाना सही है?


महिलाओं का पुरूषों की तुलना में औसत वेतन कम होता है, इसके बावजूद उन्हें सामान्य वस्तुओं के लिए ज़्यादा भुगतान करना पड़ता है। पिंक टैक्स गैरकानूनी भले ही नहीं है पर इसका प्रभाव साधारण महिलाओं के जीवन में घातक साबित हुआ है।

कुछ वर्ष पहले कोकाकोला बनाने वाली कंपनी ने सर्दियों और गर्मियों में अपने प्रोडक्ट की कीमत बढ़ने और कम करने की बात सामने रखी थी। इसके विरोध में सब लोग साथ आए थे और अपनी असहमति जताई थी। जब हम उस मुद्दे पर साथ आकर विरोध कर सकते है तो हम पिंक टैक्स से पीछा छुड़ाने के लिए अभी तक क्यों आगे नहीं आए?

इसके पीछे दो विशेष कारण हैं, पहली वजह तो अज्ञानता है, लोगो का इसके प्रति अनजान बर्ताव है और दूसरी वजह मनोविज्ञान है, हमारी मानसिकता है जिसका फायदा मार्केटिंग कंपनियां उठाती हैं। यह कारण बहुत आम प्रतीत होते हैं पर इनका प्रभाव लोगों के जीवन में काफी गहरा है। आज के दौड़ते हुए समय में हम इन बातों पर ध्यान नहीं देते और इस का बराबर फायदा उठाया जाता है।हमें लगता है कि हमारे जीवन में और कई सारी ज़रूरी बातें हैं तो हम इन छोटी-छोटी बातों पर अपना समय क्यों व्यर्थ करें लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि यह छोटी-छोटी चीज़ें ही जीवन की नींव होती हैं।


इसके पीछे दो विशेष कारण हैं, पहली वजह तो अज्ञानता है, लोगो का इसके प्रति अनजान बर्ताव है और दूसरी वजह मनोविज्ञान है, हमारी मानसिकता है

पिंक टैक्स के बारे में अगर आप अपने महिलादोस्त, सहकर्मी या परिवार के सदस्यों के बीच अचानक से बात करना शुरू कर दें तो आपको क्या लगता है कितने लोगों को इस बारे में पहले से पता होगी? इसका जवाब चौंका देने वाला है। सच तो यह है कि बहुत कम लोग पिंक टैक्स के बारे में जानते है। अमेरिका में भले ही इस बात से अधिकतर जनसंख्या परिचित है, पर भारत और कई अन्य देशों में यह आंकड़ा बहुत न्यूनतम है। हम बिना कोई प्रश्न किए, बिना कोई विचार किए अपने रोज़मर्रा कि ज़िंदगी में पिंक टैक्स भरते हैं और हमें इस बात की कोई जानकारी भी नही है।जिस बात का हमें कुछ पता ही नहीं उसका विरोध हम कैसे ही कर सकते हैं? अब आप सोच रहे होंगे कि महिलाएं जब खरीदारी करती हैं तो क्या उन्हें भुगतान कि राशि में भेदभाव नहीं दिखाई देता? जी बिल्कुल दिखाई देता है। तो फिर हम महिलाएं महंगे “फीमेलप्रोडक्ट्स” की जगह पुरूषों के लिए बनाए गए सस्ते उत्पाद ही क्यों नहीं खरीद लेती?

पर क्या यह इतना आसान है? जब किसी वस्तु या उत्पाद के ऊपर ‘महिलाओं के लिए’ या ‘फॉरवूमेन’ यह टैग लगा रहता है तब हमारा मन यह मान लेता है कि हमें इसी का इस्तेमाल करना है क्योंकि यह हमारे लिए बनाया गया है।अधिकतर महिलाएं यह सोचकर अपने आप को रोक लेती हैं कि पुरुषों के लिए बनाए गए प्रोडक्ट्स वह इस्तेमाल नहीं कर सकतीं। जो महिला अधिक राशि ना देनी पड़े इस वजह से प्रोडक्ट के पुरुष संस्करण को खरीदती हैं वे भी अपने मन में उस प्रोडक्ट से संतुष्ट नहीं होती। ऐसे ही मनोवैज्ञानिक खेल मार्केटिंग कंपनियां हमारे साथ आजतक खेल रही हैं।


फ्रांस में एक महिला समूह ने पिंकटैक्स के विरोध में एक साइट शुरू की और उन उत्पादों की तस्वीरें अपलोड की जिनकी कीमत असमान थी।

इसलिए अब पिंक टैक्स से महिलाओं की रक्षा करना अनिवार्य हो गया है। आज की तारीख में पिंक टैक्स से बचने का सबसे आसान तरीका इसके बारे में लोगों को जागरूक करना और सावधान करना है। फ्रांस में एक महिला समूह ने पिंकटैक्स के विरोध में एक साइट शुरू की और उन उत्पादों की तस्वीरें अपलोड की जिनकी कीमत असमान थी। हमें भी इस उदाहरण से प्रेरणा लेते हुए इस लड़ाई में अपने कदम आगे बढ़ाने चाहिए|

साक्षी देवकुमार शरन

Leave a Reply