अम्बेडकर और संविधान

अम्बेडकर और संविधान

भारतीय संविधान की संरचना एक कहानी बयां करती है जहां राष्ट्रवाद से निर्मित देश के मूलभूत तत्वों में संविधान शायद वह श्वास है, जो हमारे लोकतंत्र का आधार है| यदि हम अपने संविधान की पृष्ठभूमि को देखें तो यह स्वयं में काफी अनोखी है, 1857 की क्रांति के बाद ही ब्रिटिश राज ने भारत के शासन का उत्तरदायित्व अपने हाथों में ले लिया| 89 साल के इस अनवरत शासन काल के बाद अगस्त, 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ| 1947 के पश्चात्‌ भारत स्वतंत्र तो था लेकिन “पूर्ण स्वराज” का आना बाकी था, क्योंकि अभी भी देश एक अधिराज्य के रूप में अस्तित्व में था। आवश्यकता थी भारत को संपूर्ण लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित करने की जिसके लिए संविधान का निर्माण भी अति आवश्यक था | संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए संविधान सभा का गठन किया गया जिसके अध्यक्ष डॉ भीम राव अम्बेडकर थे | ये डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर के सफल प्रयासों का ही नतीजा है जिसने हमारे राष्ट्र को यह संविधान सौंपा |

डॉ भीम राव अम्बेडकर संविधान सभा के अध्यक्ष थे| ये उनके सफल प्रयासों का ही नतीजा है जिसने हमारे राष्ट्र को यह संविधान सौंपा|

अम्बेडकर : एक व्यक्तित्व

महाभारत में जब अंगराज कर्ण श्री कृष्ण से अपनी पहली भेंट में धर्म पर चर्चा करते हुए उनसे अपने जीवन में हुए तिरस्कार और भेदभाव पर प्रश्न करते हैं तो श्री कृष्ण उन्हें अपने अस्तित्व और अधिकार के लिए संघर्ष करने का मार्ग दिखाते हैं| डॉ बी.आर अम्बेडकर का जीवन इन्हीं संघर्षों और चुनौतियों से भरा हुआ था| बचपन में चाहे वो प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करनी हो या नगर के मंदिर में घुसने पर पाबंदी, बाबासाहेब ने अपने जीवन में केवल जातीय आधारों पर भेदभाव और तिरस्कार का सामना ही किया था| कल्पना कीजिए जिस स्कूली शिक्षा के लिए आप अपने बच्चों को विद्या के मंदिर में भेजें और वहाँ उनसे उनका पानी पीने का मानवाधिकार भी छीन लिया जाए, यह भयानक दृश्य बाबासाहेब और उनके जैसे कई दलित बच्चों के जीवन का सत्य था, जहां किसी उच्च जाति के व्यक्ति द्वारा ऊपर से जल डालने पर ही वह उसे पी सकते थे| यह कार्य मुख्य रूप से विद्यालय के चपरासी किया करते थे, अम्बेडकर आगे जाकर इसे “नो पीओन, नो वाटर” का नाम देते हैं | यह बाबासाहेब के जीवन अनुभवों की ही देन थी कि आज हमारे संविधान में किसी भी प्रकार के जातीय, धार्मिक, रंग, विश्वास इत्यादि पर आधारित शोषण एवं भेदभाव का स्थान नहीं है |


अम्बेडकर का मानना था कि संविधान कितना भी अच्छा क्यों ना हो उसे इस्तेमाल में लाने वाले लोग अच्छे होने चाहिए

अम्बेडकर की दृष्टि में संविधान

23 सितंबर, 1953 को राज्यसभा में भीमराव आंबेडकर ने कहा था कि “छोटे समुदायों और छोटे लोगों को हमेशा ये डर सताता है कि बहुसंख्यक उन्हें नुकसान पहुंचा सकते हैं। मेरे मित्र मुझसे कहते हैं कि मैंने संविधान बनाया है। लेकिन मैं आपको बताना चाहता हूं कि इसे जलाने वाला पहला व्यक्ति भी मैं ही रहूँगा। मुझे इसकी कोई जरूरत नहीं है क्योंकि ये किसी के लिए भी अच्छा नहीं है। हलांकि हमारे लोग इसे लेकर आगे बढ़ना चाहते है लेकिन हमे याद रखना होगा कि एक तरफ बहुसंख्यक है और एक तरफ अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक यह नहीं बोल सकते कि हम अल्पसंख्यकों को महत्व नहीं दे सकते क्योंकि इससे लेकतंत्र को नुकसान होगा। मुझे कहना चाहिए कि अल्पसंख्यक को नुकसान पहुंचाना सबसे नुकसानदेह होगा” | यह बात सुनने में जितनी अजीब लगती है वहीं यथार्थ में हमें बाबासाहेब की दूरदृष्टि और दार्शनिक विचारों के बारे में भी अवगत कराती है| इस वाक्यांश पर अपना औचित्य व्यक्त करते हुए सभा में एक अन्य दिन बाबासाहेब कहते हैं “मेरे मित्र ने अभी कहा कि मैं संविधान को जलाना चाहता हूं। पिछली बार मैं थोड़ा जल्दी में था लेकिन आज मेरे पास मौका है। संविधान को जलाने के पीछे कारण ये है कि हमने भगवान के रहने के लिए मंदिर बनाया कि भगवान उसमें आकर रहने लगे लेकिन यदि भगवान की जगह वहाँ राक्षस रहने लगे तो? हमने ये मंदिर राक्षस के लिए तो बनाया नहीं था। हमने तो इसे देवताओं के लिए बनाया था। अब हमारे पास इसे तोड़ने के अलावा कोई चारा ही नहीं है। इसलिए मैनें कहा था कि मैं संविधान को जला देना चाहता हूं। ” अम्बेडकर का मानना था कि संविधान कितना भी अच्छा क्यों ना हो उसे इस्तेमाल में लाने वाले लोग अच्छे होने चाहिए और चाहे संविधान कितना भी बुरा हो वह अंततः अच्छा ही साबित होगा अगर उसे इस्तेमाल में लाने वाले लोग अच्छे होंगे | बाबासाहेब यह बातें तब साझा कर रहे थे जब सभा के सभी लोग नए संविधान से अत्यधिक अपेक्षायें लेकर बैठे थे और इससे स्पष्ट होता है कि अम्बेडकर जानते थे संविधान का महत्व तब तक केवल एक किताब मात्र है जबतक हम इसका उपयोग एक महान लोकतांत्रिक राष्ट्र की नींव के तौर पर ना करें, वह यह भी जानते थे कि अल्पसंख्यक देश के अभिन्न अंग हैं और उनका उत्पीड़न केवल एक विनाशकारी समाज का मार्ग होगा |


2019 में पायल तड़वी जैसी छात्रा जो अपने समुदाय से पहली महिला डॉक्टर बनती उसकी खुदकुशी, ये घटना केवल झलक है एक भयानक दृश्य की जो रूढ़िवाद को संस्थान से जोड़ रही है |

आज का समाज और जातिवाद

भारतीय संस्कृति पर लगे जातिवाद जैसे गंभीर दाग पर चर्चा करना शायद हमेशा प्रासंगिक रहे क्यूंकि इस कुरीति से समाज में भेदभाव और ऊँच नीच जैसी अन्य प्रथाएं प्रचलित हैं | भारतीय संविधान में दिए समानाधिकार को क्या केवल एक कल्पना मात्र समझा जाए? क्या बस विश्वगुरु बनने का सपना देखना ही पर्याप्त है? यदि बात करें आज के दौर की जहां वैश्विक समाज प्रौद्योगिकी और विकास के माध्यम से आधुनिक युग की ओर बढ़ रहा है, मुझे यह काफी अचंभित करता है कि हमारे देश में जातिवाद आज भी हमारे समानाधिकार देने वाले संविधान के मौलिक सिद्धांतों का दमन कर रहा है | कभी अखबार के शीर्षक पर जातिगत आधारों पर दलितों एवं पिछड़ों पर हुए हमले, बलात्कार, भेदभाव, हत्या का समाचार पढ़ आप यह सोच सकते हैं कि इससे लड़ने के लिए संविधान निर्माता ने अपनी पूरी जिंदगी इससे लड़ने के संघर्ष में बीता दी | सांस्थानिक जातिवाद का उदाहरण भी देश में देखने को मिल सकता है फिर वो चाहे रोहित वेमुला द्वारा उदासीनता और बहिष्कार के कारण की गयी आत्महत्या हो या 2019 में पायल तड़वी जैसी छात्रा जो अपने समुदाय से पहली महिला डॉक्टर बनती उसकी खुदकुशी, ये दो घटनायें केवल झलक है एक भयानक दृश्य की जो रूढ़िवाद को संस्थान से जोड़ रहीं हैं | हमें यदि एक सम्पूर्ण भारत का निर्माण करना है तो जात और जातिवाद दोनों का ही नष्ट होना आवश्यक है, मेरा मानना है कि सरकार एवं संस्थानों में पिछड़ों का प्रतिनिधित्व और बड़े स्तर पर होना चाहिए, रूढ़िवादी विचारधाराओं का समापन घर से होगा जहां एक बच्चे का समाज उसके माता पिता बुनते हैं और यही हमें अम्बेडकर के संविधान आदर्श नागरिक बनाती है |

डॉ भीम राव अम्बेडकर यदि यह नाम सामने आए तो आपके मन में क्या विचार आयेंगे? “संविधान के वास्तुकार?” ,”एक शोषित व्यक्ति जिसने समाज की कुरीतियों के विरुद्ध आवाज उठाई?”, “समान अधिकार के लिए लड़ने वाले नायक?” आप आश्वासित हो सकते हैं कि आज के दौर में भी रूढ़िवादी सोच रखने वाले व्यक्तियों के लिए वह केवल एक नीची जाति के व्यक्ति थे जिन्होंने आरक्षण देकर केवल अपने लोगों का भला किया| बाबासाहेब अम्बेडकर को केवल एक अल्पसंख्यक नेता रूप में देखना उनका अपमान करने समान है, क्योंकि उनकी लड़ाई वर्ग विशेष के विरुद्ध नहीं बल्कि एक ऐसी ज्यादती के अंत के लिए थी, जिसके होने से आज भी देश की आत्मा का दमन किया जा रहा है |

-आयुष मिश्रा

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