गुरु गोबिंद सिंह : पराक्रम की पराकाष्ठा

गुरु गोबिंद सिंह : पराक्रम की पराकाष्ठा

“सवा लाख से एक लड़ाऊं,
       चिड़िया ते नाल बाज़ तुड़ाऊं, तबे गोबिंद सिंह नाम कहाऊं।”
                                 -गुरु  गोबिंद सिंह
 

एक उन्नतिशील और प्रतिभासंपन्न राष्ट्र के पीछे उसके इतिहास की अहम भूमिका रहती है। इतिहास हमारी संस्कृति और अटूट निष्ठा के बीच एक सेतु के रूप में विस्तृत है। भारत के गौरवशाली इतिवृत्तीओं में शूरवीरों और महात्माओं का बहुत ही संक्षिप्त वर्णन किया गया है। सनातन काल से लेकर मध्य कालीन युग तक भारतवर्ष में अनेक संत महात्मा और वीरों ने जन्म लिया जो हमारे पुराणों और मध्य कालीन ग्रंथों में विख्यात हैं ।

ऐसे ही एक शूरवीर जो कि भारतवर्ष के एक विख्यात गुरु भी थे उनकी महा गाथा का एक सारांश मैं प्रस्तुत करता हूं। मैं बात कर रहा हूं गुरु गोबिंद सिंह जी की। जब कोई भी व्यक्ति गुरु गोबिंद सिंह जी का नाम सुनता है तो उसके मन में सिर्फ एक ही व्याख्या आती है–संत-सिपाही। शौर्य और साहस के प्रतीक गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्म १६६६ में बिहार के पटना में हुआ। उनके बचपन का नाम गोविंद राय था और वे दसवें सिक्ख गुरु थे। एक आध्यात्मिक गुरु होने के साथ-साथ वे एक निर्भयी योद्धा, कवि और दार्शनिक भी थे। इनके पिता गुरु तेग बहादुर जी थे जिन्होंने मुग़ल शासक औरंगज़ेबी के ख़िलाफ़ युद्ध में धर्म और सत्य की स्थापना के लिए अपना बलिदान दिया था। अपने पिता की मृत्यु के बाद गुरु गोबिंद सिंह जी ९ वर्ष की उम्र में सिक्खों के दसवें और अंतिम गुरु बने। गुरु गोबिंद सिंह ज्ञान और बौद्धिक दृष्टि की पराकाष्ठा थे । ब्रह्मज्ञानी होने के अतिरिक्त वे युद्धनीति और युद्ध कौशल में निपुण थे। उन्होंने घुड़सवारी और तीरंदाजी में महारत हासिल की थी। गुरु जी ने सभी सिक्ख गुरुओं के उपदेशों को मिला कर गुरु ग्रंथ साहिब की रचना की। इसके अलावा उन्होंने आदि ग्रंथ और दशम ग्रंथ जैसे प्रख्यात रचनाएं भी लिखी। सन् १६९९ में बैसाखी के दिन उन्होने खालसा पन्थ की स्थापना की, जो सिक्खों के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है। खालसा की रचना उनकी सबसे अहम उपलब्धि थी जिसका उद्देश्य असहायों की रक्षा करना था। खालसा के अनुयायी अपने पंथ के प्रति निष्ठावान थे। जिन्हें गुरु जी ने “पंज प्यारे” के नाम से संबोधित किया। उनकी पहचान निम्नलिखित पांच चिन्हों से की जाती है जिन्हें हम पांच कक्कार भी कहते है :
•केश – केशों को ना काटना।
•कंघा – लकड़ी का कंघा रखना।
•कड़ा – हाथों में लोहे का कंगन धारण करना।
•कृपाण – तलवार धारण करना।
•कछैरा – “कछैरा” वस्त्र धारण करना।
गुरुजी ने खालसा के निर्माण के पश्चात “वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतेह” यह निर्देश सिक्खों को दिया था।


गुरुजी ने खालसा के निर्माण के पश्चात “वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतेह” यह निर्देश सिक्खों को दिया था।

गुरु गोबिंद सिंह ने मुग़लों से चौदह बार युद्ध लड़ा था। इसमें से १७०४ ईस्वी में लड़ा गया “चमकोर” का युद्ध सबसे ज्यादा प्रसिद्ध युद्ध था और इसे सिक्खों में सबसे ज़्यादा प्रचलित युद्ध माना जाता है। युद्ध में उन्होंने दस लाख मुग़ल सेना का सामना मात्र चालीस सिक्खों के साथ बहुत ही दिलेरी और वीरता पूर्वक किया। इस प्रचंड युद्ध में गुरु जी के दो पुत्र जिनके नाम जुझार सिंह और अजीत सिंह थे वो अदम्य साहस का परिचय देते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे। इस युद्ध में चालीस सिक्ख योद्धा शहीद हुए और सैकड़ों मुग़ल सिपाही मारे गए। गुरु गोबिंद सिंह और सिक्ख वीरों ने कई युद्धों में अनुकरणीय युद्ध कौशल और उत्कृष्ट रणनीति के बल पर विजय प्राप्त की । वर्ष १७०८ में गुरु गोबिंद सिंह जी का निधन  नांदेड़, महाराष्ट्र में हुआ था । सिरहिंद के नवाब वज़ीर खान ने अपने दो भरोसेमंद पठान सैनिक भेजे थे। उन्होंने गुरु जी पर छलपूर्वक वार किया। अपितु गुरु जी ने मूर्छित होने के बावजूद एक  पठान को अपनी कृपाण से चीर डाला। दूसरा पठान जब तक भागने की नाकाम कोशिश करता तब तक बाकी सिक्ख वीरों ने उसे मृत्यु के घाट उतार दिया था।


गुरु गोबिंद सिंह ने मुग़लों से चौदह बार युद्ध लड़ा था। इसमें से १७०४ ईस्वी में लड़ा गया “चमकोर” का युद्ध सबसे ज्यादा प्रसिद्ध युद्ध था

यदि आज भारत में संस्कार और धर्म स्थापित हैं, तो उसका अधिकतम श्रेय गुरु गोबिंद सिंह जी को जाता है। भले ही वह सिक्ख धर्म के अंतिम गुरु थे पर उन्होंने सिक्ख धर्म के लिए बहुत ही महान कार्य किये और शिक्षा प्रदान की।  गुरु गोबिंद सिंह जयंती के दिन इनके महान कार्यों को आज भी विश्व भर में याद किया जाता है और सदैव किया जाएगा। जिस प्रकार से वे देश में इतने परिवर्तन लाये, उसके लिए भारत की धरती सदैव गुरु गोबिंद सिंह जी की कृतज्ञ रहेगी।
आज हमारे विद्यालयों की पुस्तकों में मुग़ल सल्तनत और बाकी आक्रमणकर्ताओं के बारे में विस्तारपूर्वक व्याख्या की गई है, लेकिन भारतवर्ष के महान वीरों और सिद्ध पुरुषों की जीवन गाथाओं को एक पन्ने में ही सीमित रखा है। इसलिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि हम हमारे देशवासियों को भारतवर्ष के वीर पुत्रों की गाथाएं सुनाकर जनहित और जनकल्याण की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित करें। भारत के हर एक नागरिक को इस बात का आभास होना चाहिए कि ऐसे महापुरुष हमारे देश की असली धरोहर है और हमारी संस्कृती ही हमारी असली विरासत है।

– प्रणव

https://www.britannica.com/biography/Gobind-Singh

https://www.sikhiwiki.org/index.php/Guru_Gobind_Singh

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