वर्तमान परिवेश में गांधी की प्रासंगिकता

वर्तमान परिवेश में गांधी की प्रासंगिकता

आज बापू के बारे में कुछ लिखने या कहने में एक असमंजस की स्थिति उत्पन्न होती है, मैं उस महात्मा का क्या व्याख्यान करूं जिन्हें अपनी सोच के वृत्त में समेटना ही गलत हो! भारत में मानसिक गुलामी और राजनीतिक आकांक्षाओं ने पैर पसार लिए हैं, वोट बैंक से लेकर धर्म विवादों में लिपटा आज का भारत बापू की कल्पना से कितना दूर है, ये विचार करना आपके और हमारे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है| यदि मौजूदा दौर की बात करें तो आज लोग अफवाहों और इन्टरनेट द्वारा गलत माध्यम से फैलाई जानकारी वाले बापू को जानते हैं, हम भ्रामक तथ्यों पर अंधविश्वास कर बापू पर लांछन लगाने से भी पीछे नहीं हटते | क्या एक छोटी सी अफवाह हमें हमारे पुरखों एवं महात्माओं को उनके अधिकार का सम्मान देने से रोक सकती है?

महात्मा गांधी 22 वर्ष की उम्र में ही कानून में स्नातक की उपाधि प्राप्त कर अधिवक्ता बने।

मोहनदास करमचंद गांधी (महात्मा गांधी) और स्नेह से कहें जाने वाले “बापू” की जयंती आज पूरे देश में मनाई जा रही है और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पे आज के दिन को अंतराष्ट्रीय अहिंसा दिवस का नाम दिया गया है । आइए आज हम भी उनके आदर्शों और विचारों को अपने न्यूनतम सोच एवं ज्ञान से समझने का प्रयास करते हैं। बापू का जन्म 2 अक्टूबर 1869 में गुजरात के पोरबंदर शहर में हुआ था,अहिंसा और दया भाव बापू के जीवन में किशोर अवस्था से ही वर्णित है, लंदन में कानून की पढ़ाई करने जा रहे किशोर मोहनदास ने अपनी माँ को एक साधारण निरामिष एवं मादकता रहित जीवन व्यतीत करने का वचन दिया था जो आगे चलकर उनके लिए एक नैतिक जीवन का मुल्य बना। लंदन के विश्वविद्यालय में वे सभी के साथ भागवद गीता पढ़ने एवं सुनाने से लेकर पश्चिमी नृत्य में निपुण होने के लिए अतिरिक्त कक्षाएँ भी करते थे। 22 वर्ष की उम्र में ही कानून में स्नातक की उपाधि प्राप्त कर वे अधिवक्ता बने। 1893 में एक व्यापारी के केस के सिलसिले में वे दक्षिण अफ्रीका गए और वहां जीवन के 21 वर्ष व्यतीत किए | बापू के व्यक्तित्व में गहन परिवर्तन अफ्रीका में उनके कार्यकाल के दौरान ही आए। अफ्रीका बापू के लिए विदेश जरूर था किंतु वहाँ भी वे अपने मौलिक मानवाधिकारों के हनन के लिए लड़ने से पीछे नहीं हटे।

एक बार यूरोपी यात्रियों के साथ बैठने पर उन्हें एक बस से बाहर निकाल दिया गया, दूसरी घटना में फर्स्ट क्लास की सीट ना छोड़ने पर उनपर शारीरिक प्रहार किए गए और कई बार जब वह साधारण रूप से सड़क पर भी चलते तो रंगभेदी पुलिस अफसर बिना तर्क के उन्हें आघात पहुंचाने की मंशा से धक्का तक दे देते थे | इतना अपमान होने के बाद युवा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में ही अपने विरोध की आवाज उठाई | वहाँ वह भारतीय मूल के नागरिकों के मतदान करने के अधिकार के लिए लड़े | महात्मा गांधी के सत्य और अहिंसा के सिद्धांत से आगे कई क्रांतिकारी प्रेरित हुए जिनमे सबसे पहला नाम दक्षिण अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति और महान मानवतावादी नेल्सन मंडेला का आता है | अफ्रीका में गांधी के किये गये कामों को याद कर मंडेला कह्ते हैं “भारत महात्मा की जन्म भूमि है और दक्षिण अफ्रीका उनकी अभिग्रहण भूमि” | ये बापू की आभा ही थी जिसे देख नेल्सन मंडेला जैसे महान क्रांतिकारी भी अपने जीवन में उन आदर्शों का अनुसरण करते थे | वास्तव में ऐसा प्रतीत होता है कि वैश्विक स्तर पर बापू को आधुनिक काल के उन महात्माओं में से एक माना जाता है जिन्होंने सत्य और अहिंसा जैसे जीवन के परम आदर्शों पर चल के एक महान क्रांति को जन्म दिया। विदेशों में आज भी उन्हें अत्यंत विपुल सम्मान दिया जाता है | हमें सोचना होगा कि अपने ही राष्ट्रपिता की कल्पना से दूर चलते हुए हम कहाँ आ खड़े हैं? क्या हमारे अंदर मौजूद बापू के लिए वह भावभीनी भावना नष्ट हो चुकी है?

महात्मा गांधी के सत्य और अहिंसा के सिद्धांत से आगे कई क्रांतिकारी प्रेरित हुए जिनमे सबसे पहला नाम दक्षिण अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति और महान मानवतावादी नेल्सन मंडेला का आता है |

गांधी का सत्य :

आज अपने ही फायदे को तलाशता वैश्विक समाज एक जाल में फंसता जा रहा है, जहां पूरे विश्व में विचारधाराओं की लड़ाई अधिकतम निरर्थक ही साबित हुई हो वहाँ हमने एक विध्वंसक मानव समाज को बुना है। वर्तमान में मध्य पूर्व के देशों में गृह युद्ध, पश्चिम से पूर्व की ताकतों में वर्चस्व की लड़ाई और आतंकवाद जैसे विनाशकारी प्रसंगों ने हमे घेर रखा है वहां मैं स्तब्ध खड़ा केवल बापू के सत्य को निर्निमेष निहारता हूं। भारत में राजनीति बदली, सत्ताओं के रंग बदले और नई विचारधाराओं का आगमन हुआ लेकिन इन सबके बीच अगर कुछ बदला नहीं तो वह है गांधी का सत्य जो बापू के ही अनुसार निर्वाण प्राप्ति का मार्ग है। गांधी अपनी आत्मकथा “सत्य के साथ मेरे प्रयोग” में कह्ते हैं “मेरी आत्मकथा लिखने की मंशा नहीं है किंतु मेरा जीवन ही सत्य की खोज और ईन प्रयोगों पर आधारित है जिससे यह किताब स्वयं आत्मकथा का रूप ले लेगी”। गांधी के सत्य को समझना आसान नहीं क्यूंकि वह अनुभव से उत्पन्न एक वास्तविक मनोस्थिति है जिसे महान दार्शनिक आज भी पूर्ण रूप से समझने का प्रयास कर रहे हैं। इसे समझने के लिए हम महात्मा गांधी द्वारा ही प्रारंभ किए एक राष्ट्रीय आंदोलन “सत्याग्रह” को समझते हैं | सत्याग्रह का अर्थ सत्य को धारण करना है, सुनने में इस सरल शब्द पर यदि गहन अध्ययन करें तो पता चलता है इसकी जड़ें प्राचीन संस्कृत लेखों से जुड़ी हैं। सत्याग्रह वास्तव में “तत्पुरुष समास” या आत्मा का मूलभूत तत्व है जिसके बिना किसी का भी जीवन निरर्थक है। गांधी के लिए सत्याग्रह किसी भी निष्क्रिय प्रतिरोध(विरोध के मार्ग) से अत्यंत बड़ी विचारधारा थी, उनका मानना था कि असत्य केवल झूठ नहीं बल्कि अस्तित्वहीन होना भी है और सत्य का अनुसरण करने वाले विद्यमान हैं, साफ़ शब्दों में कहें तो पूर्ण रूप से जीवित। इससे यह पता चलता है कि बापू क्रांतिकारी के साथ एक अत्यंत प्रभावशाली दार्शनिक भी थे। अनुमान लगाइए यदि महात्मा गांधी का जन्म 500 या 1000 साल पहले होता तो आज उनके विचारों के धर्म का अस्तित्व में होना कोई अनोखी बात नहीं होती और यह केवल लिखने या कहने की बात नहीं अगर आप उन्हें समझने का प्रयास करें तो शायद इसका बोध कर पाएं। आप यह भी कह सकते हैं कि बापू की नजरों में सत्य असीम और निरंकुश था जो व्यक्ती विशेष के लाभ, सुख, दुख या हानि से उपर उठकर अचल रहता हो।

गांधी और रामराज्य :

बात अगर विचारधारा की करें तो आज के कुछ तथाकथित चिंतकों ने लोगों को रामराज्य का सपना दिखा कर अपने वोट बैंक भरने के अतिरिक्त और कुछ नहीं किया , जबकि वास्तव में वह स्वयं ही श्री राम और उनके आदर्शों से विसंगत हैं। इस विषय पर चर्चा करना आज अति आवश्यक है क्यूंकि इसी से हमें यथार्थ रामराज्य का बोध होगा, सत्य और धर्म पर आधारित वह शासन प्रणाली जिसकी कल्पना महात्मा गांधी ने वर्षों पहले की थी। बापू कहते हैं “रामराज्य से मेरा अभिप्राय हिंदू राष्ट्र से नहीं है किंतु राम के दिव्य राज्य या प्रभु के राज्य से है। मेरे लिए राम और रहीम एक समान हैं। मैं सत्य और नीतिपरायणता को ही अपना भगवान मानता हूं। भले मेरी कल्पना के राम कभी इस पृथ्वी पर अवतरित हुए हों या नहीं किंतु प्राचीन रामराज्य के आदर्श एक सच्चे लोकतंत्र के प्रतीक हैं जो एक शूद्र को भी बिना किसी जटिल प्रक्रिया के त्वरित न्याय प्रदान करे। जो शासन एक कुत्ते को भी न्याय दिलाए वही वास्तव में रामराज्य है। रामराज्य में एक राजकुमार और कंगाल दोनों ही समान अधिकार के योग्य हैं।” गांधी श्री राम को अपना आदर्श मानते थे और उनके लिए धर्म के अधीन कार्यरत शासक ही एक श्रेष्ठ राजा समान है। उनके लिए आर्थिक असमानता रामराज्य के लिए सबसे बड़ा खतरा था, जो लोग आज हमें गांधी के विचारों से दूर किसी कृत्रिम रामराज्य का स्वप्न दिखाते हैं अस्ल में वही चिंतक आर्थिक असमानता जैसे संकट से निपटने से दूर भागते हैं। विचार करके स्वयं समझिए कि हमें आदर्शों का रामराज्य चाहिए या राजनैतिक जुमलों वाला जिसकी नींव ही स्वार्थ और असमानता पर रखी गई हो।

दिल्ली के साम्प्रदायिक दंगों पर यदि एक नजर डालें तो पता चलता है हमारे देश का सामाजिक ताना- बाना नष्ट हो रहा है और सदाचार की राजनीति विलुप्त हो रही है

आज का भारत : गांधी की कल्पना से कितना दूर ?

हाल ही में घटित दिल्ली के साम्प्रदायिक दंगों पर यदि एक नजर डालें तो पता चलता है हमारे देश का सामाजिक ताना- बाना नष्ट हो रहा है और इसके लिए केवल हम जिम्मेदार हैं। जहां सदाचार की राजनीति विलुप्त हो रही है । हम सभी मानसिक गुलाम बनते जा रहे हैं, सत्ता के गलियारों से निकल रही एक निर्धारित कार्यावली पूरे देश को अंदरूनी रूप से जला सकती है। यह कहना शायद गलत नहीं होगा कि हम बापू के विचारों के विपरित परिस्थितियों वाले भारत का निर्माण कर रहे हैं। अपने जीवन में जिस महात्मा ने केवल सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चल इतनी बड़ी क्रांति रची हो उसके लिए भारत के आधार को टूटते हुए देखना कैसा होगा? कभी कभी ऐसा प्रतीत होता है कि अपने अधिकार के लिए लड़ने वाले भारतीय अब हर प्रकार के शोषण को मूक बने सहन कर रहे हैं। जो गांधी धर्म के आधार पर भारत का बंटवारा भी नहीं चाहते थे उनके लिए सामाजिक ध्रुवीकरण के इस परिवेश को देखना कैसा होता?

हिंदुस्तान के अधिकांश राजनैतिक दल केवल औपचारिकता वश ही बापू के विचारों पर चलने की बात करते हैं जो वास्तविकता से कितना दूर है इसका विचार आप स्वयं करें। भारत में आज के आधुनिक युग में भी जातिवाद जैसे सामाजिक अधर्म मौजूद हैं, यह कोई छुपी हुई बात नहीं की आज से लगभग 100 साल पहले ही बापू भारत के समकालीन जातीय समीकरण से उपर उठ चुके थे, जिसका उदाहरण उन्होंने दलितों और पिछड़ों को “हरिजन”(प्रभु के जन) नाम देकर ही दे दिया था। क्या प्राचीन विश्वगुरु भारत इतना ढीला पड़ चुका है कि हम केवल किसी के जन्म के आधार पर उसके साथ भेदभाव कर सकें? भारत के मुद्रा नोटों पर गांधी का चित्र होना ही पर्याप्त नहीं ब्लकि जिस दिन हम उनके व्यक्तित्व को आदर्श मान लें वही सही मायनों में उनके विचारों के भारत का निर्माण होगा। हाल ही में सत्ताधारी पार्टी के कुछ कार्यकर्ता और मंत्रियों द्वारा भी बापू के हत्यारे का महिमामंडन किया गया जो विचारधाराओं में मौजूद टकराव की अग्नि को साफ़ दर्शाता है। पिछले वर्ष ही बापू की 150वीं जयंती पर सोशल मीडिया के माध्यम से उनके हत्यारे के अमर रहने का “ट्रेंड” चलाया गया। यह बात जितना अचंभित करती है, वास्तव में उतनी ही गम्भीर है यदि वैश्विक स्तर पर इसे देखा गया हो तो सोचिए हमारी क्या छवि बनी होगी, जिस महात्मा को नोबेल पुरस्कार नहीं देने के पश्चाताप में किसी को भी नोबेल शांति पुरस्कार प्रदान नहीं किया गया उसके अपने ही देश में जनता उसके प्रति संवेदनहीन बन चुकी है। अप्रासंगिकता के इस काल में
आप सभी को गांधी जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं देते हुए मैं इस लेख का अंत महान वैज्ञानिक और मानवतावादी अल्बर्ट आइंस्टाइन की उस बात से करना चाहूँगा जो उन्होंने बापू के लिए कही थी :-

“आने वाली नस्लें शायद मुश्किल से ही विश्वास करेंगी कि हाड़-मांस से बना हुआ कोई ऐसा व्यक्ति भी धरती पर विचरण करता था।”

आयुष मिश्रा

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