आधुनिक दिल्ली की शिल्पकार

आधुनिक दिल्ली की शिल्पकार

शीला दीक्षित, जिन्होंने लगातार पंद्रह साल तक दिल्ली के मुख्यमंत्री पद का कार्यकाल संभाला, पंचतत्व में विलीन हो गयीं। दीक्षित को 19 जुलाई की सुबह दिल्ली के फोर्टिस एस्कॉर्ट अस्पताल में भर्ती कराया गया। दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार ने उन्हें राजकीय सम्मान दिया एवं दो दिन का राजकीय शोक घोषित किया। 

पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की अंत्येष्टि रविवार को सीएनजी चालित शवदाह गृह में की गई। सीएनजी चालित शवदाह गृह में उनकी अंत्येष्टि का होना अकारण नहीं बल्कि यह उनके पर्यावरण प्रेम की वजह से किया गया। उन्होंने सीएनजी शवदाह गृह सेवा की शुरुआत अपने तीसरे कार्यकाल में की थी और इच्छा जताई थी कि उनके अंतिम संस्कार में सीएनजी का उपयोग किया जाए। उन्होंने अपने कार्यकाल में दिल्ली के हरित क्षेत्र को बढ़ाने, सौ फीसद सीएनजी आधारित सार्वजनिक परिवहन तथा दिल्ली मेट्रो जैसे पर्यावरण अनुकूल काम किए। कांग्रेस की कद्दावर नेत्रियों में शुमार शीला दीक्षित का राजनीतिक सामाजिकर एवं सफ़र उनके ससुर व इंदिरा गांधी केमंत्रिमंडल के सदस्य, उमाशंकर दीक्षित से हुआ था। पंजाब के कपूरथला में जन्मी शीला कपूर ने अपनी स्नातक शिक्षा मिरांडा हाउस से ‌इतिहास शास्त्र से पूरी की।

पंजाब के कपूरथला में जन्मी शीला
दीक्षित ने अपनी स्नातक शिक्षा मिरांडा हाउस से ‌इतिहास शास्त्र से पूरी की।

1984 में इंदिरा गांधी की अकस्मात मृत्यु के पश्चात हुए चुनावों में उत्तर प्रदेश की कन्नौज सीट से एकतरफा जीत हासिल कर, दीक्षित ने अपना राजनीतिक जीवन प्रारंभ किया। इसके साथ ही, राजीव गांधी द्वारा केंद्रीय मंत्रिमंडल में संसदीय कार्यमंत्री के रूप में चुना जाना, उनके राजनीतिक समीकरण को स्थापित करने में कारगर साबित हुआ। इसके साथ ही उन्होंने महिला सशक्तिकरण के मुद्दों पर चर्चा के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का प्रतिनिधित्व किया। अगस्त  1990 में उत्तर प्रदेश की राज्य सरकार को महिला सुरक्षा के मुद्दे पर घेरने के लिए उन्हें और उनके कांग्रेसी साथियों को जेल हुई।

1998 में वह दिल्ली की मुख्यमंत्री चुनीं गई। केंद्र में उस समय ‌भारतीय जनता पार्टी की सरकार थी। दिल्ली की दोहरी संवैधानिक प्रणाली, राज्य सरकार की स्वायत्ता एवं केंद्र में अटल बिहारी सरकार से सामंजस्यपूर्ण संबंध उनके लिए एक गंभीर समस्या बनकर उभरी। इसके अलावा, कांग्रेस पार्टी के दिल्ली इकाई में दिग्गज नेताओं की गुटबाजी के चलते दीक्षित को काफ़ी समय तक समस्याओं का सामना करना पड़ा। 

2019 के लोकसभा चुनावों में शीला दीक्षित की अहम भूमिका रही।

शासनिक मोर्चे पर देखा जाए तो दिल्ली एक बड़े गांव की तरह था। परंतु शीला दीक्षित की राजनीतिक एवं शासकीय काबिलियत के चलते अगले पंद्रह वर्ष में दिल्ली का कायापलट हो गया। आधारभूत संरचनाओं को‌ महत्त्व देने के साथ ही, उन्होंने फ्लाइओवर और दिल्ली मेट्रो के काम को गति दी। उनके कार्यकाल में बिजली निजीकरण हुआएवं ‌भागीदारी योजना ‌के प्रारंभ होने पर दिल्ली में सहभागी शासन की नींव रखी गई।

उनका आखिरी कार्यकाल विवादों में घिरा रहा।  2010 के कॉमनवेल्थ खेलों में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप, उसके साथ ही 16 दिसंबर की रात को निर्भया गैंगरेप ने दिल्ली में औरतों की सुरक्षा पर सवालिया निशान खड़े किए। अन्ना आंदोलन से मुख्यधारा में आए अरविंद केजरीवाल ने भ्रष्टाचार एवं महिला सुरक्षा के मुद्दे पर राज्य की शीला दीक्षित सरकार एवं केंद्र की यूपीए सरकार को घेरा। 2013 में शीला दीक्षित को नई दिल्ली सीट से अरविंद केजरीवाल के हाथों हार का सामना करना पड़ा।

वे 2014 के लोकसभा चुनावों से पहले कुछ समय तक केरला की राज्यपाल रही। इसके पश्चात 2017 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने शीला दीक्षित को अपना मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित किया परंतु समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन होने के पश्चात उन्हें यह निर्णय वापस लेना पड़ा। 

2019 के लोकसभा चुनावों में शीला दीक्षित की अहम भूमिका रही। दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार कांग्रेस से गठबंधन चाहती थी परंतु शीला दीक्षित ने दिल्ली की कांग्रेस इकाई को स्वयं चुनाव लड़ने का प्रस्ताव दिया। अपने राजनीतिक जीवन का आखिरी चुनाव वह भारतीय जनता पार्टी के पूर्व सांसद एवं भोजपुरी गायक मनोज तिवारी के हाथों हार गई।

सिर्फ दिल्ली ही नहीं बल्कि पूरा देश उनके कार्यकाल को याद रखेगा।

-भावेश चतुर्वेदी

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