हिंदी दिवस : हिंद में हिंदी की स्थिति

हिंदी दिवस : हिंद में हिंदी की स्थिति

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।। -भारतेन्दु हरिश्चन्द्र अर्थात् “सभी उन्नति का मूल अपनी भाषा है। अपनी भाषा के ज्ञान के बिना हृदय आनंदित नहीं हो सकता. भले ही खुश होने का ढोंग कर लिया जाये, पर हृदय का शूल मिटाने के लिए अपनी भाषा…

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भारत-चीन सीमा: तनाव एवं राजनीति

भारत-चीन सीमा: तनाव एवं राजनीति

मई महीने की शुरुआत से ही विश्व के दो देशों देशों के बीच सीमा पर काफी तनावपूर्ण हालात हैं। एक है विकासोन्मुख बृहदतम लोकतांत्रिक राष्ट्र और दूसरा कम्युनिस्ट विस्तारवादी देश। जिन महानुभावों को विस्तारवादी देश का अभिप्राय अब तक नहीं समझ आ रहा है उनके लिए यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि मेरे विस्तार…

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वर्तमान परिप्रेक्ष्य में प्रेस की प्रासंगिकता

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में प्रेस की प्रासंगिकता

न्यूज़ यानी समाचार। न्यूज़ का सार्वभौम अर्थ है:- उत्तर, पूरब, पश्चिम व दक्षिण, अर्थात चारों दिशाओं में अखिल ब्रह्मांड के खगोल एवं भूगोल की सूचना जिससे प्राप्त हो वह है प्रेस मीडिया।विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर समाचार माध्यमों की उपयोगिता और निष्पक्षता की पड़ताल आवश्यक है। जिस तरह खगोल एवं भूगोल का तात्पर्य…

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कंधों पर सपने ढोते लोहरदगा के आदिवासी

कंधों पर सपने ढोते लोहरदगा के आदिवासी

कुछ दिनों पहले ही मैंने कहीं पढ़ा था कि ग्रामीण भारत हमारे देश के जी०डी०पी० में 70 प्रतिशत का योगदान देता है। वैसे तो मुझे आज तक भारत के ग्रामीण परिवेश को बारीकी से देखने का मौका नहीं मिला, मगर अपने महाविद्यालय बी०आई०टी० में दाखिले के सिलसिले में मुझे एक ऐसी जगह रहने का मौका…

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घटती कलमें : साहित्य रचना के प्रति आज के युवा की उदासीनता

घटती कलमें : साहित्य  रचना के प्रति आज के युवा की उदासीनता

प्राचीन काल से ही भारत साहित्य रचना में अपना महत्तवपूर्ण योगदान देता रहा है। फिर बात चाहे वैदिक ऋषिगणों द्वारा रची गई कविताओं की करें या भक्ति काल के भजनों की। किन्तु आज हम ये विचार विमर्श करने पे विवश हैं कि देश के युवाओं में इस विषय के प्रति इतनी अरुचि क्यूँ है? हमारे…

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जवाहरलाल नेहरु : एक नया नज़रिया

जवाहरलाल नेहरु : एक नया नज़रिया

जवाहरलाल नेहरू के बारे में बात करते हुए कौन डरते हैं? वह डरते हैं, जिनके पास बात करने के लिए तथ्य नहीं हैं। कहने को कुछ न हो तो बेफिजूल की बातें बोलनी शुरू कर देते हैं। वर्तमान में भारत की समष्टि से व्यष्टि की ओर सिमटती राजनीति के कारण आम भारतीय देश के महापुरुषों…

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हिंदी दिवस: औपचारिकता या अधिकार?

हिंदी दिवस: औपचारिकता या अधिकार?

भारत की संविधान सभा ने जब 1949 में हिंदी की व्यवहारिकता, वैज्ञानिकता और सरलता जैसी विशेषताओं को ध्यान में रखकर हिंदी को देश की राजभाषा स्वीकार किया था, तभी से हम प्रत्येक वर्ष गर्व और सम्मान के साथ 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाते हैं। वैसे देखा जाए तो हिंदी दिवस सभी…

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