बदलती पीढ़ियों का विभेद

बदलती पीढ़ियों का विभेद

कट जाती पूरी उम्र है, रिश्ते अनमोल बनाने में !
लट जाती पूरी रसना है, मीठे दो बोल सुनाने में!!
बट जाती पूरी दुनिया है, इनका इक मोल भुनाने में!
है लगता इक भी पल नही, विष इनको घोल पिलाने में!!
इसलिये –
गर दिये है रब ने रिश्ते अनेक, इस चितचोर जमाने में!
सो सहेज सको सबको सदा, ऐसा मांगो कुछ पाने में!!

-‘चेतन’ नितिनराज् खरे
निरंतर जनाकीर्ण रहने वाला इंडिया गेट वीरान सा हो गया था।

भारतीय संस्कृति में परिवार को एक मजबूत नकल तंत्र के साथ आदर्श समरूप इकाई के रूप में देखा जाता है। हमारे देश में इसे बड़ी सामाजिक प्रणालियों की एक बुनियादी, एकजुट और अभिन्न इकाई माना जाता है। भारत जैसे विविधता से भरे देश में परिवारों के पास कई रूपों की बहुलता है जो वर्ग, जातीयता और व्यक्तिगत विकल्पों के साथ बदलती है। हमारे लिए यह सुरक्षा की पहली पंक्ति है और अस्तित्व, स्वास्थ्य, शिक्षा, विकास एवं संरक्षण में एक प्रमुख कारक। यह पोषण, भावनात्मक संबंध और समाजीकरण, निरंतरता और परिवर्तन के बीच की कड़ी और एक प्रमुख स्रोत की भूमिका निभाता है। समस्याएं होने पर स्थिरता और समर्थन हमें सर्वधिक अपने परिवार से ही मिलता है। परन्तु आधुनिक जीवन के दबावों का सामना करने में असमर्थता के कारण भारतीय परिवारों को बहुत से उतार चढ़ाव से गुजरना पड़ रहा है। बदलते वक्त के साथ, कई चीज़े बदल जाती है, जैसे पूर्वतः जब मोबाइल फ़ोन नहीं हुआ करते थे, तब घर के सभी लोग एक साथ बैठते थे, एक दूसरे से बातें किया करते थे, मगर आज के समाज में हमें एक नया बदलाव देखने को मिल रहा है। माता-पिता व परिवार से बच्चों का लगाव बेहद कम उम्र में ही खत्म हो रहा है। उनके बीच के फासले बढ़ते जा रहे हैं। बच्चे अपने माता-पिता से पैसे व सारी सुविधाएं तो चाहते हैं लेकिन अपने जीवन में उनकी दखलंदाजी बिल्कुल पसंद नहीं कर पाते। माता-पिता भी व्यस्त होने के कारण अपने बच्चों के हाथ में मोबाइल फोन या टी.वी. का रिमोट थमा देते हैं। उनके पास उन्हें छोटी-छोटी बातें जो कि बच्चों के मानसिक विकास के लिए महत्वपूर्ण होती है, समझाने का भी समय नहीं होता। वे यह भूल चुके है कि बच्चों को मूल्य संस्कार देना और भविष्य की परिस्थितियों के लिए तैयार करना किसी स्कूल का नहीं, माता-पिता का दायित्व होता है। वह संस्कृति जो हमारे परिवार का निर्माण खंड हुआ करती थी, इस आधुनिकता में कहीं खो सी गई है। सदस्यों के बीच विभिन्न विचारों के विवाद से ले कर दूर होते मन और बढ़ते तनाव, परिवार की मूल परिभाषा को ही बदलने लगे हैं। इस दिशाहीन चल रहे दौर के बीच आई कोरोना महामारी।

विद्यालय, विश्वविद्यालय, उद्योग, दुकान, सिनेमा घर आदि सभी बंद हो गए थे। सभी कामकाज ठप हो गए।

कोविड-19 महामारी ने दुनिया भर के लोगों को अपने घर में ही कैद रहने के लिए विवश कर दिया, या नजरबंद कहना भी गलत नहीं होगा। भारत देश में भी कोविड-19 के बढ़ते संक्रमण को मद्देनजर रखते हुए 24 मार्च 2020 को प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा उठाए गए कदम-लॉकडॉउन ने समस्त देशवासियों में कुंठा और घबराहट का माहौल उत्पन्न कर दिया। देश में कोविड-19 के मामलों पर नियंत्रण हासिल करने के लिए यह कदम आपातकालीन परिस्थितियों में लिया गया। विद्यालय, विश्वविद्यालय, उद्योग, दुकान, सिनेमा घर आदि सभी बंद हो गए। सभी कामकाज ठप हो गए। छात्रावास में रहने वाले छात्रों को अपने-अपने घर भेजा जाने लगा, प्रवासी भी पलायन करने लगे। अस्पतालों में दवाई, बेड, ऑक्सीजन और राशन के दुकानों में रोज़मर्रा की चीज़ों के लिए भी लंबी लाईने लगनी शुरू हो गई। देश में आर्थिक मंदी का एक काला साया आ चुका था। जहां एक तरफ लोग अनेक परेशानियों का सामना कर रहे थे वहीं दूसरी ओर लोगों को एक दूसरों को गहराई से जानने और अपने रिश्तों को बेहतर समझने का अवसर मिला। वर्क फ्रॉम होम और ऑनलाइन शिक्षा की स्थापना भी भारत में इसी समय एक बड़े स्तर पर की गई। अब देश में हर परिवार जहां माता-पिता सुबह से शाम काम से बाहर रहते थे, बच्चे स्कूल कॉलेज में व्यस्त थे, उन्हें अपना पूरा दिन एक दूसरे के साथ घर में व्यतीत करना था।

लॉकडाउन से पहले जैसा समय चल रहा था उसकी आधुनिकता में खोकर हम सब अपने परिवार से भावुक रूप से दूर होते जा रहे थे। इसका कारण था- आधुनिक जीवनशैली में आए अंतर। वे दिन गए जब भारतीय मध्य और उच्च वर्ग यह कह सकते थे कि हमारे सामाजिक मानदंड पश्चिम से भिन्न हैं। आज युवा पीढ़ी अधिकतर विदेश में अध्ययन करने और काम करने जाती है और बहुत पहले ही वेब द्वारा एक विस्तृत दुनिया से अवगत हो जाती है, इसलिए उनका दृष्टिकोण अपने अभिभावकों से अलग हो जाता है। उनके मॉडर्न लाइफ़स्टाइल में कई ऐसी चीजें शामिल होती हैं जिनसे उनके माता-पिता को आपत्ति होती है। स्मोकिंग, शराब पीना, देर रात पार्टी करना, रैंडम रोड ट्रिप्स, सेम सेक्स मैरेज, प्री मैरिटल अफेयर्स आदि युवाओं के लिए सामान्य है लेकिन यह उनके माता-पिता के लिए एक बड़ी बात है। इस विचारधारा में आए अंतर का असर हमारे संबंधों पर सोच से अधिक प्रभावशाली होता है।

लॉकडाउन ने हमें उन दिनों में वापस जाने का मौका दिया, जब परिवार के साथ व्यतीत किए पल दिन के सबसे महत्त्वपूर्ण और खुशहाल पल हुआ करते थे।

इस स्थापना ने बच्चों को अपने माता पिता से वापस जुड़ने का, उनके साथ समय व्यतीत करने का और उनके बीच की पीढ़ी अंतराल को कम करने का एक अवसर दिया। पीढ़ी अंतराल के बारे में सरल भाषा में कहें तो यह दो पीढ़ियों के लोगों के बीच के रहन सहन, व्यवहार, सोच, विचारधारा, जीने के नजरिए, में आए अंतर को दर्शाता है। एक पीढ़ी की विचारधारा अपने आगे वाली पीढ़ी से अकसर कुछ विषयों पर अलग होती है परंतु आज के ज़माने में यह अंतर प्रचुर है। इस पीढ़ी अंतराल का सबसे अत्यधिक प्रभाव माता-पिता एवं संतान के रिश्ते पर ही देखा जाता है। कई बार एक परिवार में अलग पीढ़ियों के विचार आपस में मेल नहीं खाते हैं और इस तेज़ी से आगे बढ़ रही दुनिया में हमारे पास इतना समय नहीं होता कि एक दूसरे के पास बैठकर उन्हें अपनी बात फुरसत से समझा सकें। यही अधूरी और अनकही बातें मनमुटाव की नींव बनती हैं। हालांकि दो लोग अपनी जगह सही हो सकते हैं लेकिन एक दूसरे को अपनी बातों का सही तात्पर्य समझाने में असमर्थ होने की वजह से सामने वाले के दुःख का कारण बन जाते हैं। देखा जाए तो जनरेशन-ज़ेड के लोग अपना जीवन अपने उसूलों, सिद्धांतों और स्वतंत्रता के साथ जीना चाहते हैं। उन्हें अपना भविष्य बेहतर बनाने की चिंता रहती है पर उनकी विचारधारा का झुकाव अपने आज में जीने की ओर होता है। वे जीवन के हर एक लम्हें को उसी लम्हें में जी लेना चाहते हैं। वहीं माता-पिता अपनी संतान के भविष्य को बेहतर और सुरक्षित बनाने को ज़्यादा महत्व देते हैं। इस पीढ़ी अंतराल से आए रिश्तों में कड़वाहट को दूर करने में यह तालाबंदी काफ़ी हद तक कारगर साबित हुई है।

हमने कभी नहीं सोचा था कि हमें इतने लंबे समय तक घर में बंद रहना होगा। हालांकि, इस बार हमें अपने परिवार के साथ खोए रिश्ते को पुनर्जीवित करने का एक मौका मिला। तेजी से भागती ज़िन्दगी के साथ, हम जी रहे थे, परंतु यह भूल चुके थे कि अपने परिवार के साथ समय बिता कर कितने अनगिनत मीठे पलों को उत्पन्न किया जा सकता है। लॉकडाउन ने हमें उन दिनों में वापस जाने का मौका दिया, जब परिवार के साथ व्यतीत किए पल दिन के सबसे महत्त्वपूर्ण और खुशहाल पल हुआ करते थे।

टेलीविजन पर हमारे सभी पसंदीदा शो का आनंद परिवार के साथ बैठ कर लेते हुए और उन खूबसूरत पुराने लम्हों को याद करते-करते हमारा अधिकतर समय बीत गया।

बचपन में जब हमारे पास मोबाइल फ़ोन नहीं हुआ करते थे तब हम लूडो, शतरंज जैसे खेलों के साथ ही अपना मनोरंजन करते थे, लेकिन बड़े होने पर उन्हें बैठ कर खेलने और आनंद लेने का समय हमें कभी मिला ही नहीं। हालांकि, उन लम्हों ने इस लॉकडाउन में हमारे जीवन में एक शानदार वापसी की है। शारीरिक रूप से अपने परिवार और दोस्तों के साथ आनंदमय समय व्यतीत कर पाए जिससे हमें फिर से अपने बचपन में जाने का अवसर मिला। इस तालाबंदी ने कैनटीन और होटलों के खाने को छोड़कर माँ के हाथों के लाजवाब ज़ायके को फिर से चखने का और आत्मा तृप्त करने का मौका दिया। एक परिवार के रूप में खाने के लिए एक साथ बैठना सबसे विशिष्ट कार्यों में से एक था जिस पर हमने जैसे विराम ही लगा दिया था। लेकिन तालाबंदी ने परिवार के सभी सदस्यों के साथ बैठ कर खाने की परंपरा को भी निर्वाचित कर दिया। हम सभी एक साथ भोजन करते समय अपने परिवार के लोगों से भी वार्तालाप कर पाए। अपनी दिनचर्या, भविष्य की परियोजना, देश-विदेश के विषयों पर चर्चा आदि बातें डायनिंग टेबल पर रोज होने लगी। हमने एक-दूसरों के अनुभवों के बारे में और गहराई से जाना एवं उन्हें और बेहतर समझने की एक नई शुरुआत की। इससे हमारी परेशनियाँ भले ही कम नहीं हुई किंतु हमारी मानसिक स्वास्थ्य मुनासिब ज़रूर हो गई। तालाबंदी के पूर्व घर से दूर कॉलेज या काम में व्यस्त बच्चों के लिए किसी-किसी दिन सिर्फ एक कॉल लगाकर माता-पिता के बारे में जानना पहाड़ सामान लगता था, उन्हीं बच्चों ने घर के कार्यों में अपनी माँ का हाथ बटाया, जिस घर में लोगों के पास खुद के लिए समय नहीं था, उसी घर के हर सदस्य ने कपड़े धोने से लेकर बर्तन धोने तक का काम किया, जो एकजुट होने और रिश्तों को और गहरा बनाने का एक सुनहरा माध्यम बना। जब हमने यह सुना था कि रामायण फिर से प्रसारित होने वाली तो हम कितने उत्साहित थे! दूरदर्शन इस लॉकडाउन को उत्साहपूर्ण और आनंदमय बनाने में और हमारे लिए बीते हुए उस सुनहरे युग को वापस लाने में पूर्ण रूप से सक्षम रहा। टेलीविजन पर हमारे सभी पसंदीदा शो का आनंद परिवार के साथ बैठ कर लेते हुए और उन खूबसूरत पुराने लम्हों को याद करते-करते हमारा अधिकतर समय बीत गया। दुनिया से दूर हो कर हम अपनों के करीब आ गए, और रिश्तो में पड़ी कई गाठें भी सुलझ गई।

भारतीय परिवारों के रिश्तों में आई दूरियों का एक कारण यह भी था कि पहले जहाँ अधिकांश बच्चे एक संयुक्त परिवार में बाक़ी बच्चों के साथ मिलजुल कर प्रेम से रहा करते थे वहीं आज मूल परिवार में रहने वाले लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है| पहले समय पर खाना भी मिल जाता था और बड़े-बुजुर्गों की प्यार भरी डांट में भी कमी नहीं होती थी। बच्चे अपनी रोजमर्रा की दिक्कतें या उलझनें अगर अपने अभिभावकों से नहीं बता पाते तो अपने हमउम्र बच्चों से या परिवार के किसी और सदस्य से बांट लेते थें। मूल परिवार में रहने वाले बच्चों के सवाल इस तेज गति से बढ़ रही आधुनिक जीवनशैली में कहीं दब कर रह गए हैं। इस कम्युनिकेशन गैप के कारण विश्वास और निकटता कि कमी रिश्तों में देखने मिल रही है।

पीढ़ी अंतराल का मुख्य कारण ही है कि दुनिया का इकलौता निरंतर सत्य ‘बदलाव‘ है।

हर रिश्ते की नींव विश्वास पर टिकी होती है इसलिए माता-पिता और बच्चों को एक दूसरे पर विश्वास रखना चाहिए। अगर कभी हमारे अभिभावक हमें समझाए या कुछ करने से रोके तो एक पल के लिए हमें सोचना ज़रूर चाहिए कि वे हमारे हित को ध्यान में रखकर ही हमें समझाएंगे। माता-पिता को भी अपने बच्चों की बातों को गंभीरतापूर्वक सुनकर और समझकर ही किसी निर्णय पर पहुंचना चाहिए। अपने बच्चों को छूट देते समय उन्हें कुछ सीमाएं निर्धारित ज़रूर करनी चाहिए जिसका बच्चों को भी सम्मान करना चाहिए। इससे वे दोनों एक-दूसरे के ज्यादा करीब आ पाएंगे। मेरी राय अनुसार दो पीढ़ियों के बीच में अंतराल के कारण अनबन स्वाभाविक है परंतु बच्चों को बस इस बात का ख़्याल रखना चाहिए कि वह अपने सारे विचार अपने माता-पिता के समक्ष शिष्टता एवं संयम के साथ रखे। संभवत: जिस बात पर वे हमसे आज सहमत नहीं है, भविष्य में उसी बात को लेकर हमें अपनी अनुमति दे-दे। इसके अतिरिक्त किसी भी रिश्ते का एक आधार समझौता भी होता है। हर किसी की राय अलग होती है और अगर दोनों ही पक्ष अपनी-अपनी राय पर टिके रहें तो झगड़े होना लाज़मी है। हालांकि किसी अन्य से अलग राय होना पूरी तरह से ठीक है लेकिन कभी-कभी यह संघर्ष का एक कारण भी बन सकता है। ऐसे में अपने विचारों को सही साबित करने का प्रयास छोड़कर कुछ बातों पर समझौता करने की आदत भी डालनी चाहिए। ऐसा करने से हम एक दूसरे की बातों का सम्मान करते हुए मनमुटाव से बच सकते हैं।

दो-तरफा संचार एक मज़बूत सम्बंध का आधार है और माता-पिता और बच्चों के सुखद संबंध के लिए यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि वे इसे बनाए रखें। हर गंभीर मुद्दे पर चर्चा की जानी चाहिए और दोनों पक्षों को इस पर बहस करने की जगह एक दूसरे के दृष्टिकोण को समझने का प्रयास करना चाहिए। मानव जाति लगातार विकसित हो रही है और इसलिए विभिन्न पीढ़ियों से सम्बंधित लोगों की विचारधाराओं में बदलाव आया है। पीढ़ी अंतराल का मुख्य कारण ही है कि दुनिया का इकलौता निरंतर सत्य ‘बदलाव‘ है। लोगों में यह समझ होनी चाहिए कि अलग-अलग समय में पले बड़े लोग एक-दूसरे से भिन्न होते हैं। एक-दूसरे पर अपने विचारों और विश्वासों को थोपने की जगह एक-दूसरे के व्यक्तित्व का सम्मान करना चाहिए।

यूनिसेफ फ़ोटोग्राफ़र टॉमिस्लाव कहते है, “यह सच है-इस संकट ने मानवता पर अपना असर डाला है। हालांकि, इसने पीढ़ियों को एकजुट होने का अवसर भी प्रदान किया है और शायद हमारी युवा पीढ़ियों को अपनी अलग-अलग भूमिकाओं के बारे में भिन्न सोचने के लिए बढ़ावा देना शुरू कर दिया है और सामूहिक समस्याओं का भी हल खोजने के लिए सभी को अपने-अपने तरीके से योगदान देने के लिए प्रेरित किया है।” गार्टनर, के एक शोध के अनुसार, 2030 तक जनरेशन-जेड के पूरी तरह से कार्यबल में प्रवेश करने के कारण रिमोट काम की मांग 30% बढ़ जाएगी। शोध में यह भी कहा गया है कि आज के 64% पेशेवर कहते हैं कि वे कहीं भी काम कर सकते हैं। कोविड-19 स्थिति ने दूरस्थ कार्य की आवश्यकता पर और बल दिया है। उद्योग के अनुमानों के अनुसार, लॉकडाउन की स्थिति सामान्य होने के बाद भी एक मिलियन से अधिक आईटी कर्मचारियों को दूरस्थ कार्य संरचना के साथ जारी रहने की उम्मीद है। गोदरेज इंटेरिओ के मुख्य परिचालन अधिकारी, अनिल माथुर के अनुसार तत्काल भविष्य में और अधिक घरेलू संरचनाओं के साथ, पारिवारिक बंधन की वर्तमान प्रवृत्ति व्यापार में आने वाली एक तेज़ लेहर की गवाह बनेगी। लोग परिवार के लिए जगह बनाये जा रहे हैं और हर दिन अपने बंधन को मज़बूत करने के लिए खुशी-खुशी एक साथ समय बिता रहे हैं।

जितना अधिक समय हम अपने परिवार के साथ बिताते हैं, हम उन्हें बेहतर ढंग से समझने लगते हैं।

लॉकडाउन के बाद हम निश्चित रूप से अपने परिवार को बेहतर जानने लगे हैं अथवा उनके विचारों का भी स्वागत करने लगें हैं। जितना अधिक समय हम अपने परिवार के साथ बिताते हैं, हम उन्हें बेहतर ढंग से समझने लगते हैं। कदापि हम अभी भी अपने परिवार के साथ किसी विषय पर विभिन्न विचारों से भरी चर्चा कर रहे हैं, लेकिन लॉकडाउन ने हमें उन्हें और उनकी विचारधारा को स्वीकार करने के लिए अधिक समय दिया है, जिस कारणवश परिवार की इकाइयां पहले से कई ज़्यादा मज़बूत हो गई हैं। इस तालाबंदी में हमने अपने ही परिवार की तस्वीरों को प्यार भरी नजरों से क़ैद करने के लिए बाहरी दुनिया से अपने लेंस बदल दिए हैं। ऐसे घरों में जहाँ चार पीढ़ियां एक साथ रहती हैं, वहां मनोरंजन से भरपूर खेल, पारिवारिक समारोह, साझा करने, खोज करने और नए कौशल सीखने से तथा अपने प्रियजनों को बेहतर समझने कि संतुष्टि के कारण जश्न सा माहौल बन गया है। लोग इस महामारी के ख़त्म होने का इंतज़ार कर रहे हैं, पर जिस दुनिया में अब वे क़दम रखेंगे वह निश्चित रूप से अलग होगी। हालांकि, सकारात्मक प्रभाव यह है कि उस नई दुनिया में रिश्तों की अहमियत समझने और उन्हें मज़बूत बनाने वाले परिवार अवश्य होंगे।

-रितिका

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