अफ़ग़ानिस्तान संकट

अफ़ग़ानिस्तान संकट

 

अमेरिकी वायुसेना के उड़ान भरते इस विमान में जगह न मिलने से 19 वर्षीय फुटबॉल खिलाड़ी जाकी अनवारी ने कुछ लोगों के साथ विमान के पहिये से ही चिपक कर अफ़ग़ानिस्तान छोड़ने का फ़ैसला किया। परन्तु यह एक असफल प्रयास रहा और अनवारी एवं एक अन्य व्यक्ति की मौत विमान से गिरने से हो गयी।  विचलित कर देने वाली यह तस्वीर काबुल हवाईअड्डे की है। ये अफगानी नागरिक अमेरिकी वायु सेना के एक विमान को पकड़ने की कोशिश कर रहें हैं ताकि वे खुद को तालिबान के चंगुल से बाहर निकाल पाए। अनवारी उन लाखों अफ़ग़ानी युवाओं में से एक थे जो किसी भी हाल पर आज अफ़ग़ानिस्तान छोड़ना चाहते है। इन मौतों की जवाबदेही आज कोई नहीं लेना चाहेगा। मानवता की बात करने वाले महाशक्तिशाली देश भी आज खुलकर निंदा करने में खुद को असहज पा रहे हैं।

15 अगस्त को जब हम अपने आजादी की 75वीं सालगिरह मना रहें थे तब हमारा पड़ोसी देश अफ़ग़ानिस्तान तालिबानी कट्टरपंथियों के ग़ुलामी की ऐसी जकड़न में जा रहा था जिससे निकलना काफी मुश्किल होगा। बस एक दिन पहले 14 अगस्त को ही अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी ने कहा था की काबुल पूरी तरह सुरक्षित है और वो हार नहीं मानेंगे। परन्तु अगले ही दिन जब तालिबान के लड़ाकों ने काबुल को चारों ओर से घेर लिया तब अफ़ग़ान सेना ने घुटने टेक दिए और राष्ट्रपति अशरफ़ गनी ने इस्तीफा देकर देश छोड़ दिया। पिछले कुछ महीनों में तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान के ज़्यादातर प्रांतों पर अपना कब्ज़ा जमा लिया और काबुल पर फ़तह के साथ अब वो वहाँ अपनी सरकार बनाने जा रहा है। इस कट्टरपंथी समूह का वहाँ के सरकार पर काबिज़ होने के कारणों का विश्लेषण करना आज काफी महत्वपूर्ण है।

तालिबान उदय की पृष्ठभूमि

अफ़ग़ानिस्तान में स्थिरता काफ़ी पहले ही चली गयी थी। ज़हीर शाह अफ़ग़ानिस्तान के तीसरे शासक थे जिन्होंने कम्युनिस्ट सोवियत रूस के प्रगतिशील विचारों का अनुकरण करने की कोशिश की। महिलाओं को स्वेच्छा से बुर्का पहनने की अनुमति दी गयी, बदलाव के इस दौड़ में सार्वजनिक क्षेत्र ने महिलाओं की भागीदारी में आश्चर्यजनक वृद्धि देखी। इससे अफ़ग़ानिस्तान के विभिन्न क्षेत्रों पर हावी आदिवासी समूहों के नियंत्रण को खतरा पैदा हो गया। उन्हें रूढ़िवादी इस्लामिक वर्ग का समर्थन मिल रहा था। जब वहाँ साम्यवाद का प्रभाव बढ़ने लगा तब वहाँ के कट्टर चरमपंथियों को इसका डर सताने लगा। 1978 के अफ़ग़ान तख्तापलट के बाद सोवियत सेना ने दिसंबर 1979 में सोवियत समर्थक सरकार बनाने के लिए अफ़ग़ानिस्तान पर आक्रमण किया और बबरक कर्मल को अफ़ग़ानिस्तान के सोवियत समर्थित शासक के रूप में स्थापित किया। फिर मुजाहिदीन के रूप में जाने जाने वाले गुरिल्ला लड़ाकों के समूह ने सोवियत सेना के खिलाफ विरोध और जिहाद कर दिया। इस युद्ध में लगभग 10 लाख अफ़ग़ान नागरिक और लगभग 15,000 सोवियत सैनिक मारे गए। दिलचस्प बात ये है कि तब अमेरिका ने अपने फायदे के लिए इन मुजाहिदीनों का साथ दिया था, उन्हें हथियार भी दिए। लगभग 10 साल चले इस कत्लेआम के बाद 1989 में सोवियत ने अपने सारे सैनिकों को वापस बुला लिया। सोवियत सेना की वापसी और 1991 में सोवियत संघ के पतन के बाद, नजीबुल्लाह की कम्युनिस्ट समर्थक सरकार चरमरा गई। सत्ता की लालच में अलग – अलग समूह आपस में ही लड़ने लगे और इसके साथ आया अफ़ग़ानिस्तान में अराजकता का एक ऐसा दौर जिसने गृहयुद्ध का रूप ले लिया। सोवियत युद्ध का राजधानी काबुल पर ज्यादा असर नहीं पड़ा था। 1992 में मुजाहिदीन नेता गुलबुद्दीन हिकमतयार के लड़ाकों द्वारा क्रूर हमले में काबुल को काफी क्षति का सामना करना पड़ा और इस घटनाक्रम में करीब 50000 लोगों ने अपनी जानें गंवाई। अन्य प्रांतों में भी कई मुजाहिदीन समूह आपस में ही भिड़े हुए थे। यह बात भी नहीं भूलनी चाहिए कि यह दौर हत्यायों एवं बलात्कारों का भी दौर था। इस गृहयुद्ध का सीधा असर वहाँ के नागरिकों पर हो रहा था, जिनकी परेशानी सुनने वाला अब कोई नहीं था। अमेरिका की पूंजीवादी सरकार साम्यवादी विचारधारा के सख्त खिलाफ थी, और उसी के फैलाव को रोकने के लिए उसने मुजाहिदीनों की मदद कर एक ऐसी बड़ी गलती कर दी जिसका भुगतान अफ़ग़ानिस्तान आज तक कर रहा है।

मई 1992 से अक्टूबर 1996 तक अफगानिस्तान में  एक भयानक गृहयुद्ध के दौरान की तस्वीर

 

गृहयुद्ध के बीच तालिबान का उदय

तालिबान के उदय को हम गृहयुद्ध के इसी दौर के बीच तलाश सकते हैं। पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान में मुजाहिदीन समूहों और धार्मिक मदरसों से निकलने वाले अतिरूढ़िवादी अफ़ग़ान छात्र-योद्धा, जिन्हें तालिबान के नाम से जाना गया, उन्होंने व्यवस्था बहाल करने और अधिक सुरक्षा लाने का वादा कर दक्षिणी अफ़ग़ान शहर कंधार पर अपना कब्ज़ा कर लिया। विभिन्न गुटों के रोज की लड़ाई और कत्लेआम से तंग लोगों ने उस वक्त तालिबान का समर्थन किया। ऐसा माना जाता है कि मुख्य रूप से पश्तून आंदोलन पहले धार्मिक मदरसों में दिखाई दिया – जिसका ज्यादातर भुगतान सऊदी अरब के पैसों से किया गया, जो सुन्नी इस्लाम के कट्टर रूप का प्रचारक था। परन्तु जैसे —जैसे वे क्षेत्रों पर नियंत्रण करते गए, इस्लाम की अपनी कठोर व्याख्या को उस क्षेत्र पर थोपते चले गए। उन्हें सैन्य योजना में पाकिस्तान से और वित्त पोषण में सऊदी अरब से अपार समर्थन मिला। 1996 तक अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की सरकार बन गयी थी। तालिबान के शासन में अधिकांश महिलाओं को काम करने से मना कर दिया गया, लड़कियों की शिक्षा पर प्रतिबंध लगा दिया और मार-पीट, विच्छेदन और सार्वजनिक निष्पादन जैसे दंड दिए गए। दो महाशक्तियों की स्पर्धा के कारण गृहयुद्ध में फंसे इस देश पर तालिबान नाम का एक ऐसा संकट आया, जिसने मानवाधिकार उल्लंघन, क़त्ल, बलात्कार, एवं अपहरण के एक भयावह दौर की स्थापना की।9/11 हमले के बाद एक अमेरिकी नेतृत्व वाले गठबंधन ने सैन्य हमलों के साथ तालिबान और अल-कायदा को लक्षित करते हुए ऑपरेशन एंड्योरिंग फ्रीडम शुरू किया। आतंकी ठिकानों पर जब हवाई हमले होते थे तो उसमें कई अफ़ग़ानी नागरिक भी मारे जाते थे। उनके मानवाधिकारों को सुनिश्चित करने वाला शायद कोई नहीं था। अमेरिका समर्थित उत्तरी गठबंधन ने 13 नवंबर 2001 को काबुल में प्रवेश किया तथा तालिबान को उनके शासन से उखाड़ फेंका। बीते 20 सालों में भी अफ़ग़ानिस्तान में स्थिरता कभी नहीं आयी। तालिबान एवं अन्य आतंकी समूहों द्वारा हमले होते रहे। इन हमलों में सबसे ज्यादा नुकसान अफ़ग़ानी नागरिकों को पहुँचा। 2001 के बाद अनुमानित 75000 अफ़ग़ान सैनिक और पुलिस अधिकारी प्रत्यक्ष युद्ध में मारे गए और अतिरिक्त अनुमानित 71000 नागरिक युद्ध के कारण मारे गए। करीब 2500 अमेरिकी सैनिकों ने अभी अपनी जानें गंवाई। ये मौतों की संख्या अमेरिकी एवं अन्य नाटो सैनिकों के अफ़ग़ानिस्तान में दाखिल होने के बाद की है। इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है की वहाँ की परिस्थिति कैसी थी या है।

काबुल, अफ़ग़ानिस्तान: 14 अक्टूबर 1996, तालिबान ने सख्त इस्लामी कानून  ‘शरिया ‘ लागू करते हुए काबुल के एक मूवी थियेटर को जला दिया।

 

फिर भी तालिबान के जाने के बाद वहाँ महिलाओं को मुख्यधारा में लाने के लिए, शिक्षा के लिए, रोजगार के लिए, औद्योगीकरण के लिए, विकास के लिए, खेल-कूद के लिए एवं शान्ति बहाल करने के लिए कई महत्वपूर्ण एवं सराहनीय कदम उठाये गए। चुनाव भी हुए और उसमें महिलाओं की भी भागेदारी रही। अफ़ग़ानिस्तान जैसा देश, जहाँ कई लोग रूढ़िवादी विचारधारा से जुड़े है, वहाँ हम एकदम से बदलाव की उम्मीद नहीं कर सकते। लेकिन वहाँ एक उम्मीद की किरण थी, जोकि शायद 15 अगस्त, 2021 को तालिबान के दुबारा देश पर कब्ज़े से वापस ख़त्म हो गयी।

नागरिकों के मौलिक अधिकारों एवं मानवाधिकारों के लिए एक बड़ा ख़तरा

एक तरफ़ जहाँ समस्त विश्व ये मान चुका है की महिलाओं में भी पुरुषों जितना ही सामर्थ्य है, लेकिन तालिबान ने तो उन्हें इंसान का अधिकार देना भी मुनासिब नहीं समझा। उनसे उनके जीवन जीने के सारे हक़ छीन कर आज वही उन्हें सुरक्षित रखने का वास्ता दे रहा है। किसी भी नारी के जिंदगी के फ़ैसले ना तो कभी किसी पुरुष के अधीन थे और ना ही कभी होंगे। अफ़ग़ानिस्तान में रह रहीं महिलाओं के लिए अब हर दिन किसी युद्ध से कम नहीं जहां उन्हें अपने अधिकारों के लिए लड़ना होगा, हर व्यक्ति को दी जाने वाली मौलिक अधिकारों के लिए लड़ना होगा। केवल महिलाएं ही नहीं, बल्कि पुरुषों में भी जो उनके इस्लाम एवं शरीया के समझ से सहमत नहीं है उनके लिए भी तालिबान एक ख़तरा है। अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में ऐसी कई रिपोर्टें छपी है जिसमें तालिबान लड़ाकों के जुल्मों के साक्ष्य हैं जिससे इस “नयी तालिबान” के मंसूबों पर संदेह और भी गहरा हो जाता है।इस सत्य से रूबरू होना तो आज भी मुश्किल है कि जिस काबुल में पिछले 20 वर्षों में औरतों ने हर क्षेत्र में अपने हुनर को साबित किया था, सरलता कि नयी ऊँचाइयों को छूकर आने वाली पीढ़ी की महिलाओं के लिए सफलता की मिसालें क़ायम की थी आज उसी काबुल में बच्चियों की शिक्षा पर एक अंकुश लगा दिया गया है।औरतों और लड़कियों के साथ – साथ अफ़ग़ानिस्तान के बच्चों का भविष्य भी अब अंधकार में हैं। आज वहाँ बच्चे तो है परंतु बचपन नहीं। जिस कच्ची उम्र में बच्चे अपने आसपास हो रहे हर गतिविधि से कुछ सीखते हैं उसी उम्र में उन्हें गोलियों के आवाज़ के साथ अपने दिन की शुरुआत करनी पड़ेगी।औरतों पर जुल्म, लड़कियों के साथ दुर्व्यवहार जैसे कुरीतियों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के बजाए ये बातें उन्हें दिन-प्रतिदिन सामान्य लगने लगेंगीं।तालिबान का अफ़ग़ानिस्तान पर इस तरह राज स्थापित होने से भारत की चिंताए और भी बढ़ जाती है। कई आतंकी संगठनों से सांठ गांठ होने से तालिबान के शासन में अफ़ग़ानिस्तान अब आतंक का एक नया केंद्र बन सकता है, जिससे भारत एवं विश्व की आतंकवाद से लड़ाई को एक झटका लग सकता है। अगर ऐसा होता है तो उससे क्षेत्रीय आतंकी गतिविधियों में एक बड़ा इजाफ़ा आ जाएगा। तालिबान ने कहा है की वो अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन को किसी भी देश के विरुद्ध इस्तेमाल नहीं होने देगा। उनके बातों में कितनी सच्चाई है ये आने वाले वक़्त में ही पता चल पायेगा। परन्तु भविष्य ने अफ़ग़ानिस्तान के लिए क्या रखा है इसका अनुमान आज कोई नहीं लगा सकता। क्या वहाँ के नागरिकों की पीड़ाएँ कभी कम होगी? क्या दुनिया अफगान शरणार्थियों को स्वीकार करेगी? हज़ारों सवाल है, लाखों मतें है, लेकिन एक भी ज़वाब नहीं है। इसकी जवाबदेही उन महाशक्तियों को भी लेनी होगी जिन्होंने कभी राष्ट्र निर्माण का वादा किया था।

-देवांग वत्स, रितिका

 

Citations:

A Thousand Splendid Suns by Khaled Hosseini

https://www.npr.org/2021/08/19/1028472005/afghanistan-conflict-timeline

https://www.bbc.com/news/world-south-asia-11451718

https://fortune.com/2021/08/18/cost-of-afghanistan-war-time-casualties-deaths-money/

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